गर्मियों की आलसी धुप में लेटे कुछ पल अचानक मेरे दरवाज़े पर दस्तक दे गए ... मैंने जब दरवाज़ा खोला तो वोह मेरे आंगन में यादों के कुछ पुराने पिटारे छोड़ गए थे .... मैंने नीले आसमा की तरफ देखा तो दो तीन सफ़ेद से बादल यूही आवारा लडको की तरह घूम रहे थे . मुझे ऐसे लगा जैसे उनमें से एक मेरी ओर देखकर मुस्कुरा रहा था ... मैं भी पलटकर कर मुस्कुराया ... सच कहू तो अजीब भी लगा और अच्छा भी ... मैंने चौककर अपने आस पास देखा ... किसी ने मुझे मुस्कुराते तो नहीं ना देखा ... उस वक़्त आँगन के आम के पेड़ और गेंदे के फूलके पौधे के अलावा वहां कोई नहीं था ... मैं उन पिटारो को अन्दर ले आया , कुछ तो एकदम नए से लग रहे थे और कुछ पर धुल सी जमी थी . कुछ थोड़े बड़े थे और कुछ छोटे से ... मैंने एक पिटारे से धूल हटाई और धीरे से उसे खोला ... अन्दर झाँक के देखा तो उस पिटारे में मेरे ही ज़िन्दगी के कुछ बिखरे पन्ने समेट कर रक्खे थे ... और मेरे बचपन की कुछ चीज़े पिटारे के कोने में सम्भाल के रक्खी हुई दिखी ... एक पेंसिल, चन्द सिक्के, एक गेंद, नानी के हाथ का बुना स्वेटर और मेरी स्कूल का युनिफोर्म ... शायद यह पिटारा ज़िन्दगी की भाग दौड़ मैं कही गुम हो गया था . मैंने बड़ी सावधानी से उन पन्नो को पलट कर देखा तोह उनपर एक आधी लिखी नज़म थी और एक अधूरी कहानी ... वक़्त की बारिश में भीगे उन पन्नो में कुछ चेहरे भी नज़र आ रहे थे ... चेहरे जिन्हें मैं भूल चला था ... कुछ चेहरे बीते समय की निशानियाँ बन चुके थे और कुछ समय का शिकार ... मैं रुक गया, एक अजीब सी सीलन से मेरा पूरा कमरा भर गया ... ऐसी ही सीलन नानी की दीवारों पर मैंने कई बार देखी थी ... गर्मीयो की छुट्टियों में जब बेमौसम बारिश होती थी तब नानी के घर के छत से कुछ बूंदे दीवारों पर फिसल आती और उन बेरंग दीवारों पर अपनी निशानियाँ छोड़ जाती ... कई साल मैंने उन बूंदों की आयतों को पढ़ा हैं, मानो वोह उस घर में कभी बसनेवाली खुशियों के अफ़साने बताती वक़्त में कैद थी ... मैंने अपनी हाथो से उस पिटारे को बंद कर दिया और कमरे की खिड़की से बहार झाँक कर देखा ... वह आवारा बादल अब नहीं थे, एक मिनट के लिए ऐसा लगा जैसे इतवार को मोहल्ले में शोर मचाते कुछ बच्चो को किसी ने गुस्सा करके भगा दिया हो ... आसमा बिलकुल खामोश था ... मैंने फिर एक पिटारे को खोल दिया ... मैं थोडासा चौंक गया। पिटारे के अन्दर मेरे हाथ के लिखे कुछ ख़त थे , वोह ख़त जो मैंने कभी डाकघर में डाले ही नहीं ... मैं तो सोचता था की यह सारे ख़त कभी किसी के हाथ नहीं लगेंगे .. हाँ शायद मैं गलत था ... यह ख़त मेरे उन दिनों के गवाह थे जिन्हें मैं उस मोड़ से घसीटकर मीलो दूर छोड़ आया था ... मुझे डर हैं की वोह लम्हे कही उसी मोड़ पर खड़े मिले तो? मैं डर गया और पिटारा बंद कर दिया ... आज मैं पूरा दिन इन पिटारों को खोलता रहा, कुछ में से हसी के बुलबुले निकले तो कुछ मैं से खामोश ब़ेजुबा नज्मे ... अब शाम होने को हैं, इस बात का यकीन हो रहा हैं की ज़िन्दगी चोकलेट हैं .... दो तीन बेस्वाद परतो में लिपटी ... दिखने में काली सी ..मगर बेहद मीठी .. ज़िन्दगी चोकलेट हैं! कभी ग़म की गर्मी में पिघ जाती हैं तो कभी मुसीबतों के डीप फ्रिज में जम जाती हैं ... जिसे देखकर चेहरे पे मुस्कान छा जाये ... दो टीन परते बेस्वाद हो भी अगर, तो कोई उसे फ़ेंक तो नहीं देता ... नन्ही उंगलियों के गर्मिसे जब यह पिघल कर चुलबुले होटो को छूती हैं, जितना मजा खाने वालो को आता हैं, देखने वाले भी उतना ही लुफ्त उठाते हैं ... अपनी हाथ में नहीं तोह क्या हुआ, यह ज़िन्दगी चोकलेट हैं!
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